परिश्रम का महत्व पर निबंध | Parishram Ka Mahatva Par Nibandh

  • Post author:
  • Post category:Essay

आज का यह निबंध परिश्रम का महत्व पर निबंध (Parishram Ka Mahatva Par Nibandh) पर दिया गया हैं आप इस निबंध को ध्यान से और मन लगाकर पढ़ें और समझें। यहां पर दिया गया निबंध कक्षा (For Class) 5th, 6th, 7th, 8th, 9th, 10th और 12th के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त हैं। विद्यार्थी परीक्षा और प्रतियोगिताओं के लिए इस निबंध से मदद ले सकते हैं।

परिश्रम का महत्व पर निबंध

परिश्रम का महत्व पर निबंध 

     बिना परिश्रम के कोई उन्नति नहीं करता – सफोक्लीज

भूमिका : परिश्रम ही सफलता की कुञ्जी है। बिना परिश्रम के कछ भी प्राप्त करना सम्भव नहीं, इसलिए श्रम करना प्रत्येक का कर्तव्य है। इतिहास इसका साक्षी है कि जिन्होंने परिश्रम का महत्त्व नहीं समझा उनका पतन निश्चित रूप से हुआ।

 

महत्त्व : सृष्टि के सारे जीव परिश्रम के सहारे ही जीते हैं। चींटी से ज्ञानपुंज-मानव तक अपना जीवन-यापन परिश्रम से ही करते हैं। अतएव  परिश्रम का संबल पकड़े रहना सबका धर्म है। किन्तु इस बात का सदा रखना चाहिए कि परिश्रम वही है जिससे निर्माण होता है, रचना होती है। किनारे बैठ कर पानी पीटना भी परिश्रम है लेकिन उससे कोई निर्माण नहीं होता अतः वह परिश्रम की कोटि में नहीं आता।

 

ये भी पढ़े:- दूरदर्शन और युवावर्ग पर निबंध

 

परिश्रम मानव का मुख्य केन्द्र-बिन्दु है। परिश्रम करने वाला ही जीवन संग्राम में सफल होता है, जो छात्र परिश्रम नहीं करता, परीक्षा में असफल होत है। इसी प्रकार, किसान के परिश्रम पर देश का विकास निर्भर करता है तो श्रमिक के श्रम पर उद्योग। कोई भी देश बिना परिश्रम किए सम्पन्न राष्ट्र कभी भी नहीं कहला सकता। जापान श्रम के फलस्वरूप ही विश्व में उत्तम स्थान रखता है। इसीलिए गाँधी, बिनोवा भावे, जवाहर लाल नेहरू ने देशवासियों को परिश्रम करने का सन्देश दिया। अब्राहम लिंकन, वाशिंगटन, अम्बेदकर, लाल बहादुर शास्त्री आदि परिश्रम के कारण ही यशस्वी पुरुष कहलाये। क्योंकि –

‘श्रमेण लभते विद्या, श्रमेण लभते धनम्।
श्रमेण लभते ज्ञानम्, श्रमेण लभते यशम्।’

 

ये भी पढ़े:- पुस्तक के महत्व पर निबंध हिन्दी में

 

कुछ लोग परिश्रम की अपेक्षा भाग्य को महत्त्व देते हैं। कहते हैं – भाग्य में जो लिखा होता है, वही होता है। किन्तु बिना हाथ हिलाए भोजन भी तो मुँह में नहीं जाता। अत: केवल भाग्य के सहारे बैठना ठीक नहीं है। कहते हैं परिश्रमी पुरुषं अपना भाग्य पलट देते हैं।

 

उपसंहार : अतः हर व्यक्ति को श्रम करना चाहिए क्योंकि श्रमजीवी हो ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ तथा देशप्रेमी होते हैं। परिश्रमी का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। किन्तु अकर्मण्य अथवा कामचोर, बेईमान, निष्ठुर तथा देशद्रोही होत हैं। ऐसे व्यक्ति देश, जाति की हानि के सिवाय और कुछ नहीं करते। सिफ श्रमी या परिश्रमी ही इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अमर रखते हैं।

Mukul Dev

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।