Essay on Flood in Hindi | बाढ़ पर निबंध हिंदी में

आज का यह निबंध बाढ़ पर निबंध हिंदी में (Essay on Flood in Hindi) पर दिया गया हैं। आप इस निबंध को ध्यान से और मन लगाकर पढ़ें और समझें। यहां पर दिया गया निबंध कक्षा (For Class) 5th, 6th, 7th, 8th, 9th, 10th और 12th के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त हैं। विद्यार्थी परीक्षा और प्रतियोगिताओं के लिए इस निबंध से मदद ले सकते हैं।

Essay on Flood in Hindi

[आरंभ, कारण, दृश्य, हानि, लाभ, उपसंहार]

400 Words

अधिक वर्षा का पानी बाढ़ का कारण बनता है। यह पहाड़ों एवं समतल भूमि पर गिरता है। नदियों की सतह नीची होती है। इसलिए वर्षा का पानी उनमें बह जाता है। जब नदियाँ अधिक पानी को नियंत्रित करने में असफल हो जाती हैं, तब पानी उनके किनारों से ऊपर उठकर बहने लगता है । यह घटना बाढ़ कहलाती है। कभी-कभी पहाड़ों पर बर्फ का पिघलना भी बाढ़ का कारण बनता है। यह नदियों के जल-स्तर को बढ़ा देता है। सदियों के पानी को बाँध के द्वारा नियंत्रित किया जाता है। कभी-कभी उनमें दरारें उत्पन्न हो जाती हैं और बाढ़ आ जाती है।

 

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कभी-कभी तो बाढ़ अचानक ही आ जाती है। यह लोगों को अपना सामान बचाने का अवसर ही नहीं देती है। यह रात में अचानक प्रेत की तरह आ जाती है और लोगों के सामानों को बहाकर ले जाती है। यह लोगों के लिए दु:ख और तबाही लेकर आती है। पलक झपकते लोग बेसहारा हो जाते हैं। बहुत-से पुरुष, स्त्री बच्चे एवं मवेशी बाढ़ में दह जाते हैं। खेतों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं। मानव एवं मवेशी के मृतशरीर पर्यावरण को प्रदूषित कर देते हैं, जो महामारी का कारण बनता है। यातायात एवं अन्य स्रोत विनष्ट हो जाते हैं। लोग पूरी तरह से निराधार एवं बेसहारा हो जाते हैं।

 

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परिस्थिति को नियंत्रित करने के लिए सरकार बहुत-से उपाय करती है। अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन दोनों ही तरह की सहायताएँ उपलब्ध करायी जाती हैं। अल्पकालीन सहायता के तहत लोगों को भोजन, वस्त्र, औषधि आदि पहुँचाये जाते हैं। निजी संस्थाएँ भी प्रभावित लोगों को सहायता देती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता, धार्मिक लोग और अन्य सभी वर्गों के संवेदनशील लोग भोजन, पैसा और वस्त्र इकट्ठा करके बाढ़ पीड़ितों तक पहुंचाते हैं। दीर्घकालीन सहायता में सरकार बीज बँटवाती है। लगान मुक्त करती है, कृण उपलब्ध कराने के साथ-साथ अन्य सहायताएँ भी शीघ्र उपलब्ध करायी जाती हैं।

 

कुछ आवश्यक कदम उठाकर बार-बार बाढ़ के आने को रोका जा सकता है। नाला बनाकर, नदियों के किनारों को ऊँचा उठाकर और मजबूत बाँध बनाकर इन्हें रोका जा सकता है। सरकार सुरक्षा का उपाय करती है। लेकिन, सुरक्षा के उपाय हेतु अधिक पैसों की आवश्यकता होती है। इसलिए, इस कार्य हेतु एक मजबूत कोष की व्यवस्था करनी होगी।

 

Essay on Flood in Hindi

600 Words

बाढ़ का अर्थ है जलप्लावन, अर्थात जब जल मर्यादा में नहीं रहता, मर्यादा तोड़कर कछारों के ऊपर से अतिवेग में बह निकलता है। यह प्रकृति-रानी का कुटिल भू-संचालन है, जिसके कारण जल जीवन का पर्याय नहीं रहता, वरन मरण का उपकरण बन जाता है। जब गर्मी अपनी जवानी पर रहती है, तो उसके ताप से हिमपिंड पिघलकर द्रुतगति से बह निकलते हैं।

 

अत्यधिक वर्षा होने पर तो नदी में अँटाव के बाहर जल आ जाता है। नदियों में जब बहुत जलराशि आ जाती है, तो फिर कुल-कछारों को तोड़ती, तटों को डुबोती जलधारा चारों ओर बहने लगती है और लगता है जैसे समुद्र ही चारों ओर लहरा रहा है। जिधर देखिए, उधर पानी, केवल पानी! महाप्राण निराला के शब्दों में शत घूर्णावर्त तरंग-भंग उठते पहाड़, जल राशि, राशि जल पर चढ़ता, खाता पछाड़! जल का यह दृश्य हमें प्रलय की याद दिलाने लगता है; मानो सारी सृष्टि जलमग्न हो गयी हो और एक अकेला मनु बच रहा हो।

 

यह देखकर हम त्राहि-त्राहि करने लगते हैं। ऐसी घड़ी में हमें किसी अगस्त्य की याद आती है, जो चुल्लुओं में सारा जल पी ले या किसी गोपसखा कृष्ण की स्मृति हो उठती है, जो अपनी छिंगुनी पर गोवर्धन उठाकर इस जलप्लावन के मध्य छाते के नीचे एक ऐसा सुरक्षित द्वीप स्थापित कर दे, जिसपर लोग रहकर अपने प्राणों की रक्षा कर सकें।

 

जब बाढ़ दिन में आती है, तब लोगों को सतर्क होने का अवसर मिल जाता है; किंतु जब वह चुपके-चुपके किसी सूचना या विज्ञापन के बिना रात के धुंधलके में आती है, तब सचमुच हमारे सर्वनाश का सारा सरंजाम तैयार कर देती है। फण फैलाये व्याल-सी उत्ताल तरंगें मानो सब-कुछ लील लेना चाहती हों। जिधर देखिए उधर ही ‘जो जैसे तैसे उठि धावा, बालवृद्ध कोउ संग न लावा की स्थिति व्याप्त हो जाती है। अबोध बच्चों एवं अबलाओं के क्रंदन-रुदन से दिग्दिगंत काँपने लगता है।

 

मालजाल कुकुरमुत्ते-से बहने लगते हैं। छोटी-छोटी झोपड़ियों की बात कौन कहे, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। चूहे-बिल्लियों की बात कौन कहे, बड़े-बड़े गजराज भी बहते नजर आते हैं। भण्डारों में सुरक्षित अन्न की बात कौन कहे, लहलहाती सुनहली फसलें नष्ट हो जाती हैं। जिधर देखिए उधर ‘हाय अन्न, हाय अन्न’ की गुहार मच जाती है।

सचमुच, बाढ़ प्रकृति की विकरालता तथा निष्ठुरता की बड़ी ही दर्दनाक कहानी है। जो चीन की ह्वांगहो तथा अपने देश की कोशी नदी के बाढ़ के भुक्तभोगी हैं, वे ही बाढ़ की दानवी लीला का यथार्थ विवरण प्रस्तुत कर सकते हैं। बाढ़ से अपार हानियाँ हैं। संचित अन्न तथा उत्पाद्य अन्न के नष्ट होने से अकाल का ताण्डव-नृत्य आरंभ हो जाता है।

 

घरों के नष्ट होने से आवास की कठिनाई हो जाती है। भयानक जलप्लावन में तैरती सड़ी-गली लाशों की दुर्गध से महामारी फैलने की आशंका होने लगती है। इस प्रकार अकाल, आवासहीनता तथा बीमारी-यह त्रिदोष घेर लेता है और इससे उबरना बड़ा ही कठिन हो जाता है।

सरकार की सारी विकास-योजनाएँ ठप पड़ जाती हैं और सारे संसार के समक्ष उसे अपनी भिक्षा की झोली फैलानी पड़ती है। इतना ही नहीं, कल के राजा आज के रंक हो जाते हैं। कहीं तो जमीन ही नदी के पेट में समा जाती है, कहीं उपजाऊ मिट्टी की छाती पर बालू का पहाड़ खड़ा हो जाता है। ऐसे विरले ही भाग्यवान हैं, जिनकी बलुआही भूमि पर सोना उगलनेवाली मिट्टी जमती हो।

 

चाहे वह पुराणों के ‘जलप्रलय’ की कथा हो, चाहे बाइबिल के ‘डेल्यूज’ या कुरान के ‘तूफान-ए-नूह’ की कहानी, उस समय के मानव ने जिस साहस के साथ बाढ़ से निबटकर आज तक नयी सृष्टि चलायी, आज का वैज्ञानिक मानव भी उससे कम साहस और चेष्टा से इसके समाधान के लिए तत्पर नहीं है।

वह अब अपनी बुद्धि से तटबंधों, नहरों, जलागारों, जलद्वारों, जलावरोधों तथा अन्य दिशा में जल-मुख-परिवर्तन द्वारा कुछ ऐसा कर देना चाहता है कि युग-युग का अभिशाप यदि तत्क्षण वरदान न भी बने, तो कम-से-कम अभिशाप नहीं रह जाय। भाखड़ा-नंगल, कोशी, हीराकुद, नागार्जुनसागर इत्यादि नदीघाटी-योजनाएँ इन्हीं उत्पातों पर मानवीय विजय की चिरस्मरणीय गाथाएँ हैं।