सत्यवादिता पर निबंध हिन्दी में | Essay on Satyawadi in Hindi

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आज का यह निबंध सत्यवादिता पर निबंध (Essay on Satyawadi in Hindi) पर दिया गया हैं। आप इस निबंध को ध्यान से और मन लगाकर पढ़ें और समझें। यहां पर दिया गया निबंध कक्षा (For Class) 5th, 6th, 7th, 8th, 9th, 10th और 12th के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त हैं। विद्यार्थी परीक्षा और प्रतियोगिताओं के लिए इस निबंध से मदद ले सकते हैं।

Essay on Satyawadi in Hindi

Essay on Satyawadi in Hindi

सत्यवादिता परिभाषा : सत्यवादिता दृष्टि का प्रतिबिम्ब है, जान की प्रतिलिपि है, आत्मा की वाणी है। सत्यवादिता के लिए केवल निष्कपट मन चाहिए। एक झूठ के लिए हजारों झूठ बोलने पड़ते हैं, झूठ की लम्बी श्रृंखला मन में बैठानी पड़ती है।

इसी बात को शास्त्र ने समझाया है- सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। अर्थात् सच बोलो, पर प्रिय यानी भली मंशे से सच बोलो; अप्रिय यानी बुरी मंशे से सच कभी न बोलो।

 

महत्ता : संसार में जितने महान व्यक्ति हुए हैं, सबने सत्य का सहारा समाह-सत्य की उपासना की है। चन्द्रटी सरजटौटी जगत व्यवहार क उद्घोषक राजा हरिश्चन्द्र की सत्यनिष्ठा जगद्विख्यात है। महात्मा गाँधी ने सत्य की शक्ति से ही विदेशी शासन की जड काट दी। उनका कथन हैसत्य एक विशाल वक्ष है. उसकी ज्यों-ज्यों सेवा की जाती है, त्यों-त्यों उसमें अनेक फल आते हए नजर आते हैं: उसका अंत नहीं होता वस्तुतः, सत्य-भाषाण और सत्य-पालन के अमित फल होते हैं।

 

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सत्य बोलने का अभ्यास बचपन से ही करना चाहिए। कभी-कभी झूठ बोलने से कुछ क्षणिक लाभ हो जाता है। बच्चे झूठ बोलकर माँ-बाप से पैसे झीट लेते हैं, पढ़ाई का बहाना करके सिनेमा चले जाते हैं, किन्तु यह क्षणिक लाभ उनके जीवन-विकास का मार्ग अवरुद्ध कर देता है उनके चरित्र में छिद्र होने लगता है और रिसता हुआ चरित्र कभी महान हो नहीं सकता।

 

झूठ बोलनेवालों के प्रति लोगों का विश्वास उठ जाता है। उनकी उपेक्षा सर्वत्र होती है। उनकी उन्नति के द्वार बंद हो जाते हैं। कभी-कभी तो उन्हें अपनी बेशकीमती जिन्दगी से भी हाथ धोना पड़ता है। क्या आपने उस चरवाहे लड़के की कहानी नहीं सुनी है जो भेडिया आया, भेड़िया आया कहकर लोगों को उल्लू बनाता था? जो झूठ की मूठ पकड़कर दूसरों का शिकार करते हैं वे खुद ही शिकार हो जाते हैं।

 

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सत्य की महिमा अपार है। बाइबिल का कथन है-यदि तुम सत्य जानते हो, तो सत्य तुम्हें मुक्त कर देगा। सत्य महान और परम शक्तिशाली है। संस्कृति की सूक्तियाँ हैं ‘सत्यमेव जयते, नानतम्’ तथा ‘नहि सत्यात् परो धर्म:’-‘सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं तथा सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं। जॉन मेंसफील्ड की धारणा है कि सत्य की नाव से ही हम मृत्युसागर का संतरण कर सकते हैं। पायथैगोरस की उक्ति है कि सत्य ईश्वर की आत्मा है, किन्तु इससे आगे बढ़कर उन्होंने यह भी कहा कि सत्य ही ईश्वर है। हमारे यहाँ ईश्वर को सत्य कहा गया।

 

उपसंहार : सत्य सदा परिकल्पना से दृढ़-दृढ़त्तर होता है। इस पर ही संसार का ज्ञान-विज्ञान आधारित है। सारा मानव-समाज इसकी धुरी पर ही कायम है। जिस समाज में खाली झूठ-ही झूठ का प्रचलन हो, वह समाज कभी समाज रह न पाएगा। सत्य के पथ में भले खाइयाँ मिले, किन्तु उस पथ से विचलित होना ठीक नहीं है। सत्य के खिलाफ बोलना ईश्वर के खिलाफ बोलना है उसे दुःखित करना है। असत्य बोलनेवाले प्रभु के प्रिय तो होते नहीं, उलटे दंड के भागी बनते हैं। सत्य से बढ़कर कोई पुण्य नहीं और असत्य से बढ़कर कोई पाप नहीं।

Mukul Dev

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।