Biography of Jaishankar Prasad in Hindi

Biography of Jaishankar Prasad in Hindi | जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

पूरा नाम  जयशंकर प्रसाद साहू
जन्म 1889 ( माघ शुक्ल दशमी, संवत 1946 )
निधन 15 नवंबर 1973
माता-पिता  श्रीमती मुन्नी देवी एव देवी प्रसाद साहू
पितामह शिवरतन साहू [सुरती बनाने के कारण सूघनी साहू के नाम से विख्यात]
शिक्षा आठवीं तक। संस्कृत, हिंदी, फारसी, उर्दू की शिक्षा घर पर नियुक्त शिक्षकों द्वारा
विशेष परिस्थिति बारह वर्ष की अवस्था में पितृविहीन, दो वर्ष बाद माता की भी मृत्यु। परिवार में गृहकलह की स्थिति। ज्येष्ठ भ्राता,शंभु रतन की मृत्यु से संकट की स्थिति उत्पन्न, सभी उत्तरदायित्व प्रसाद जी के कंधों पर।
रचनाएँ कलाधर उपनाम से ब्रजभाषा में सवैयों की रचना, प्रसाद की प्रेरणा से उनके भांजे अंबिका प्रसाद ने इंदु का प्रकाशन 1909 से प्रारंभ किया, कालक्रम के अनुसार चित्राधार प्रथम संग्रह, जिसमें कविता, कहानी, नाटक आदि रचनाएँ संकलित।

काव्य संकलन : झरना (1918), आँसू (1925), लहर (1933), अतुकांत रचनाएँ : महाराणा का महत्त्व, करुणालय, प्रेम पथिक। प्रबंध काव्य : कामायनी (1936)

कथा संग्रह : छाया (1912), प्रतिध्वनि (1931), इंद्रजाल (1936)

नाटक : कल्याणी परिणय (1912), प्रायश्चित (1914), राग्यश्री (1915), विशाख (1929), कामना (1927) जन्मेजय का नागयज्ञ (1926), स्कंदगुप्त (1926), एक घुट (1928), चंद्रगुप्त (1931), ध्रुवस्वामिनी (1933)

उपन्यास : कंकाल (1929), तितली (1934), इरावती (अपूर्ण, 1940)

साहित्य में स्थान जयशंकर प्रसाद जी को हिंदी साहित्य में नाटक को नई दिशा देने के कारण ‘प्रसाद युग’ का निर्माणकर्ता तथा छायावाद का प्रवर्तक कहा गया है।

 

आधुनिक हिंदी की स्वच्छंद काव्यधारा के अंतर्गत छायावादी काव्य प्रवाह के प्रवर्तकों में जयशंकर प्रसाद वरिष्ठ थे। ‘छायावाद’ हिंदी की आधुनिक कविता में स्वच्छंदतावाद के ही एक विशिष्ट रूप को कहते हैं। इस विशिष्ट भावधारा में व्यक्तिचेतना, स्वानुभूति, प्रकृति-साहचर्य, उन्मुक्त प्रेम, कल्पनाशीलता, स्वातंत्र्यभावना आदि नवीन भावों की उत्कट चेतना थी और अभिव्यक्ति पद्धति में लाक्षणिकता, चित्रात्मकता, अमूर्तन, रहस्यात्मकता, दार्शनिकता, सांगीतिकता आदि का आग्रह था।

छायावादी काव्यभाषा भी अभिव्यक्ति के अनुरूप तत्सम प्रधान, संस्कृतनिष्ठ और नबीन थी काव्यभाषा और अभिव्यक्ति पद्धति में परंपरा के जर्जर, विगलित रूपों तथा रूढ़ियों का निषेध तथा एक ऐसी सर्जनात्मक मौलिकता थी जिसमें बहुविध नवाचार झलकते थे। वास्तव में छायावाद की काव्यभाषा और अभिव्यक्ति पद्धति में परंपरा का पूर्ण निषेध न होकर जैसे उसका पुनर्जन्म था, उसमें परंपरा की नवीन स्मृति थी। जयशंकर प्रसाद का साहित्य इन तथ्यों का प्रामाणिक साक्ष्य प्रस्तुत करता है।

जयशंकर प्रसाद न केवल एक महान छायावादी कवि थे बल्कि वे एक महान नाटककार, उपन्यासकार कहानीकार एवं निबंधकार भी थे । इन विधाओं और साहित्यरूपों में उनका युगांतरकारी अवदान है । कवि के रूप में उन्होंने आरंभ में ब्रजभाषा में कविताएँ लिखीं किंतु शीघ्र ही उन्होंने काव्य रचना के लिए युगानुरूप नई साहित्यिक भाषा-खड़ी बोली हिंदी अपना ली ।

कविता के क्षेत्र में उन्होंने गीत, प्रगीत, लंबी प्रबंधात्मक कविताएँ आदि शैली रूपों की रचनाएँ प्रस्तुत की । किंतु उनका सर्वश्रेष्ठ अवदान है-‘कामायनी’ । ‘कामायनी’ समग्ररूप में ‘छायावाद’ की प्रतिनिधि और उत्कृष्ट काव्य कृति तो है ही; वह आधुनिक हिंदी का श्रेष्ठतम महाकाव्य भी है । इसमें प्रलय के बाद मानवीय सृष्टि के विकास की पौराणिक कथा का आश्रय लेकर मनुष्य के मानसिक-आध्यात्मिक विकास के संक्षिप्त इतिवृत्त को बड़े अर्थपूर्ण संकेतों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। कश्मीरी शैव दर्शन की पृष्ठभूमि में इस महाकाव्य में कवि का जीवन दृष्टिकोण भी बड़े प्रभावशाली रूप में व्यक्त हो सका है। स्वभावतः ‘कामायनी’ में आधुनिक मानव सभ्यता की मार्मिक समीक्षा भी हो गई है।

‘कामायनी’ से लिए गए प्रस्तुत अंश में महाकाव्य की नायिका श्रद्धा, जो वस्तुत: स्वयं कामायनी है, आत्मगान प्रस्तुत करती है । इस गान में श्रद्धा (जो वस्तुतः विश्वासपूर्ण आस्तिक बुद्धि है जिसके द्वारा विकासगामी ज्ञान एवं आत्मबोध प्राप्त हो पाता है) विनम्र स्वाभिमान से भरे स्वर में अपना परिचय देती है; अपने सत्ता-सार का व्याख्यान करती है । प्रकारांतर से यह नारीमात्र का परिचय और महिमागान हो जाता है।

प्रसाद जी के पास ऐतिहासिक बुद्धि थी। वे मानव-भाग्य के संबंध में दार्शनिक दृष्टिकोण से तो चिंतन करते ही थे, समाज और जाति के भाग्य के संबंध में भी उन्हें सोचना पड़ा । मानव सभ्यता संबंधी प्रश्नों पर उनका चिंतन बराबर चलता था । उनको समाज और जाति ने अर्थात आधुनिक जीवन-जगत ने जो दृष्टि प्रदान की-वह थी राष्ट्रवादी सांस्कृतिक अभ्युत्थान से प्रेरित । उन्होंने अतीत के गौरवमय चित्र उपस्थित कर इस राष्ट्रीय सांस्कृतिक अभ्युत्थान में योग दिया।
– मुक्तिबोध