Malik Muhammad Jayasi

Biography of Malik Muhammad Jayasi | मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन परिचय

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Biography of Malik Muhammad Jayasi

पूरा नाम मलिक मुहम्मद जायसी
जन्म 15वीं शती उत्तरार्ध, अनुमानतः 14921
निधन 1548 अनुमानत
निवास-स्थान जायस, कब्र अमेठी, उत्तर प्रदेश
पिता मलिक शेख ममरेज (मलिक राजे अशरफ)।
गुरु सूफी संत शेख मोहिदी और सैयद अशरफ जहाँगीर
कृतियाँ पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम, चित्ररेखा, कहरानामा (महरी बाईसी), मसला या मसलानामा (खंडित प्रति प्राप्त)। इनके अतिरिक्त चंपावत, होलीनामा, इतरावत आदि कृतियाँ भी उल्लेख में आती हैं।
शिक्षा
आरंभ में जायस में रहते हुए किसानी, बाद में शेष जीवन फकीरी में, बचपन में ही अनाथ, साधुओं-फकीरों के साथ भटकते हुए बचपन बीता ।

व्यक्तित्व चेचक के कारण रूपहीन तथा बाई आँख और कान से वंचित । मृदुभाषी, मनस्वी और स्वभावतः संत ।

मलिक मुहम्मद जायसी जीवनी

लोकजीवन में प्रचलित प्रेमकथाओं को आधार बनाकर छंदोबद्ध कथाकाव्य लिखने की परिपाटी प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य में ही रही थी। संभव है, वह संस्कृत में भी रही हो। यह परिपाटी साधारण जन-जीवन के प्रत्यक्ष अभिप्रेरण और संरक्षण में आगे उत्तरोत्तर बढ़ती हुई हिंदी में अव्याहत चलती चली आई। इसे हिंदी में प्रेमाख्यानक काव्य कहते हैं।

चौपाई-दोहा आदि की कड़बक शैली में निबद्ध ये काव्य प्रायः अवधी में मिलते हैं । किसानों और कारीगरों की भाषा अवधी में ब्रज की गीतिमयता ओर कोमलता की तुलना में कथावृत्तों को विवरण और विस्तार में सहेज सकने की क्षमता थी।

इस्लाम और उसके साथ तसव्वुफ (सूफी मत) के आगमन के बाद इसी प्रेमाख्यानक काव्य-परंपरा में अनेक मुसलमान कवि हुए जिन्होंने पहले से जन-प्रचलित प्रेम कहानियों को सूफी प्रेभ साधना के अभिप्रायों से संबलित कर काव्य के रूप दिए।

 

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मुल्ला दाउद से लेकर जानकवि और उससे भी आगे तक यह परंपरा अबाध रूप से चलती रही। मलिक मुहम्मद जायसी इस परंपरा की अन्यतम कड़ी हैं। जायसी के लिखे अनेक काव्य प्राप्त होते हैं जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ. माताप्रसाद गुप्त आदि अनेक विद्वानों द्वारा अलग-अलग ‘जायसी ग्रंथावली’ के नाम से संपादित हैं ।

जायसी की उज्ज्वल अमर कीर्ति का आधार है उनका महान कथाकाव्य ‘पद्मावत’ जिसमें चित्तौड़ नरेश रतनसेन और सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा है। इस प्रेमकथा का त्रिकोण पूरा होता है दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन के इस कहानी से जुड़ जाने से।

अंशतः ऐतिहासिक आधार वाली इस कहानी का विकास जनश्रुतियों एवं आगे स्वयं कवि की सर्जनात्मक कल्पना द्वारा हुआ है। मलिक मुहम्मद जायसी प्रेम की पीर’ के कवि हैं ।मार्मिक अंतर्व्यथा से भरा हुआ यह प्रेम अत्यंत व्यापक,गूढ आशयों वाला और महिमामय है।

 

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यह प्रेम अनुभूतिमय, रासायनिक एवं इस अर्थ में क्रांतिकारी है कि यह विभिन्न आख्यान में सजीव कहानी का मर्मस्पर्शी वेदनामय रस है और चरित्रों, उनके सुलगते-दहकते मनोभावों के दुर्निवार प्रभाव हैं जो पाठकों-श्रोताओं को अपने लपेटे में ले लेते हैं ।

इस प्रेमाख्यानक काव्य द्वारा विद्वेष और कलह के उस यंत्रणामय कठिन समय में धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक सद्भाव और साझेदारी की एक ऐसी जमीन जायसी ने तैयार की जो हमारी बहुमूल्य विरासत का हिस्सा है।

जायसी की इस प्रेम कहानी में प्राणों का प्राणों से, हृदय का हृदय से, मर्म का मर्म से और जीवन विवेक का जीवन विवेक से ऐसा मानवीय मेल है जो उनके काव्य को बहुत ऊँचा उठा देता है और उसमें व्यापकता और गहराई एक साथ ला देता है। खाँड़ जैसी मीठी और खालिस अवधी में लिखे गए इस काव्य में कवि की विशालहृदयता, मार्मिक अंतर्दृष्टि और लोकजीवन के विस्तृत ज्ञान की अभिव्यक्ति हुई है।

 

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यहाँ प्रस्तुत दो कड़बक अलग-अलग संकलित हैं। ये पद्मावत के क्रमशः प्रारंभिक और अंतिम छंदों में से हैं, किंतु कवि और काव्य की विशेषताएँ निरूपित करते हुए दोनों के बीच एक अद्वैत की व्यंजना करते हैं।

प्रारंभिक स्तुतिखंड से लिए गए प्रथम कड़बक में कवि एक विनम्र स्वाभिमान के साथ अपनी रूपहीनता और एक आँख के अंधेपन को प्रकृतिप्राप्त दृष्टांतों द्वारा महिमान्वित करते हुए रूप से अधिक अपने गुणों की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं। इन गुणों के ही कारण ‘पद्मावत’ जैसे मोहक काव्य की रचना हो सकी ।
अंत के उपसंहार खंड से लिए गए द्वितीय कड़बक में कवि अपने काव्य और उसकी कथासृष्टि के बारे में हमें बताते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने इसे रक्त की लेई लगाकर जोड़ा है जो गाढ़ी प्रीति के नयनजल में भिगोई हुई है।

 

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अब न वह राजा रत्नसेन हैं और न वह रूपवती पद्मावती रानी है, न वह बुद्धिमान सुआ है और न राघवचेतन या अलाउद्दीन ही । इनमें कोई आज नहीं रहा किंतु उनके यश के रूप में कहानी रह गई है। फूल झड़कर नष्ट हो जाता है पर उसकी खुशबू रह जाती है।

कवि यह कहना चाहता है कि एक दिन वह भी नहीं रहेगा पर उसको कीर्ति सुगंध की तरह पीछे रह जाएगी। जो भी इस कहानी को पढ़ेगा वही उसे दो शब्दों में स्मरण करेगा। कवि का अपने कलेजे के खून से रचे इस काव्य के प्रति यह आत्मविश्वास अत्यंत सार्थक और बहुमूल्य है।

जायस जायसी के माध्यम से हिंदी साहित्य ने न सिर्फ अपने युग की, बल्कि युगों के भीतर कड़कती हुई मानवीय विषाद की तस्वीर देखी जिसमें निष्कलंक आदर्श भी हैं और बहुत कड़वे यथार्थ भी हैं, झिलमिलाती यूटोपिया भी है और रिश्वतखोरी पर चलते हुए कारागार भी हैं, सत और साका भी है और छल से भरा हुआ विध्वंसकारी राजहठ भी है।

इस कवि की निर्मलता इसमें नहीं है कि जायसी सिर्फ चुनी हुई निष्कलंक चीजें देखते हैं, बल्कि इसमें है कि अच्छा-बुरा जो कुछ भी है, अपनी विविधता के साथ संपूर्ण परिदृश्य का अंग हो गया है। -विजयदेव नारायण साही