मेरे प्रिय साहित्यकार पर निबंध | Essay on My Favourite Author in Hindi

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आज का यह निबंध मेरे प्रिय साहित्यकार पर निबंध (Essay on My Favourite Author in Hindi) पर दिया गया हैं आप Essay on My Favourite Author in Hindi को ध्यान से और मन लगाकर पढ़ें और समझें। यहां पर दिया गया निबंध कक्षा (For Class) 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8,9.10 और 12 के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त हैं। विद्यार्थी परीक्षा और प्रतियोगिताओं के लिए इस निबंध से मदद ले सकते हैं।

Essay on My Favourite Author in Hindi

 

लिखते तो बहुत लोग हैं लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जिनकी रचनाएँ जन-जन के मन-मन में बसती हैं। प्रेमचन्द ऐसे ही कथाकार हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारत के लोग के अन्तर को छुआ है। यही कारण है कि वे मेरे ही नहीं लाखों लोगों के प्रिय उपन्यासकार और कथाकार हैं।मुंशी प्रेमचन्द का जन्म सन् 1880 ई. में वाराणसी के निकट ‘लमही’ गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। नाम पड़ा धनपत राय। माता नहीं रही तो विमाता आई और धनपत उनकी आँख की किरकिरी बन गए। आपकी शिक्षा-दीक्षा मुश्किल से हुई। लेकिन इनकी पढ़ने में रुचि थी। उर्दू के नामी लेखकों के फसाने पढ़े। साहित्य में रस आने लगा। किसी प्रकार मैट्रिक किया और जीवन-समर में उतर गये। बाद में बी.ए. किया और स्कूल इंस्पेक्टर भी बन गये।

 

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लेकिन श्री राय नौकरी के लिए नहीं जन्मे थे। उन्हें तो उपन्यास-सम्राट बनना था। उर्दू में ‘जमाना नामक पत्रिका में लिखने लगे। लोगों ने हाथों-हाथ लिया। परन्तु कहानी-संकलन ‘सोजेवतन’ सरकार द्वारा जब्त होने के बाद हिन्दी में ‘प्रेमचन्द’ के नाम से लिखना शुरू किया और एक बार जो शुरू हुए तो अपनी कहानियों और उपन्यासों की झड़ी लगा दी। प्रेमचन्द के उपन्यास हैं-प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि, गोदान, सेवासदन, कायाकल्प और गबन। इन्होंने लगभग 300 कहानियाँ भी लिखी जो ‘मान-सरोवर’ के आठ भागों में संकलित है। सद्गति, मंत्र, कफन, पूस की रात आदि अमर कहानियाँ हैं।

प्रेमचन्द के उपन्यास भारतीय मध्य वर्ग और किसानों के जीवन और मरण की दास्तान हैं। ‘गबन’ में यदि स्त्रियों के आभूषण की प्रेमजनित विभीषिका और शहरी जीवन के चित्र हैं तो रंगभूमि में शहर और गाँव दोनों की कथा और किसानों के संघर्ष के भी। ‘निर्मला’ में दहेज की बलिवेदी पर चढ़ी जवान विधवा है जो लांछना और प्रताड़ना सह रही है। ‘सेवासदन’ में भी यह बात उभर कर आई है। ‘गजन’ लालसा का दुष्परिणाम है। ‘गोदान’ ‘भारतीय कृषक-जीवन की अमर-गाथा है। उसका सुख-दु:ख, समाज सब-कुछ आईने की तरह उसमें झलकता है। ‘होरी’ उसका रूप है।

 

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प्रेमचन्द में गोर्की जैसी गरीबी के मुकाबले की भावना है तो चैखव की भाँति उजड़ते लोगों के दुःख-दर्द की समझ भी। दायस्तोवास्की की भांति कानूनों की प्रताड़ना का उल्लेख है तो मायोवास्की जैसी लयात्मकता भी। टाल्स्यय का मानववाद है. तो तुर्गनेव की भाँति सामन्तों पर व्यंग्य करने की शक्ति भी। इन्हीं गुणों ने प्रेमचन्द को उपन्यास-सम्राट बनाया है।

 

प्रेमचन्द की भाषा का क्या कहना-इतनी सरल, सहज और सुवोध कि मत कहिए। पढ़ना क्या है भाव-सरिता में डूबतें चला जाना है। मुहावरों और कहावतों की नग-जड़ाई तो देखते ही बनती है। यही कारण है कि मुंशी प्रेमचन्द मुझे बहुत प्रिय हैं।

Mukul Dev

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।