Essay on National Flag in Hindi | राष्ट्रीय झंडा (राष्ट्रीय ध्वज) पर निबंध

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आज का यह निबंध राष्ट्रीय झंडा (राष्ट्रीय ध्वज) पर निबंध (Essay on National Flag in Hindi) पर दिया गया हैं। आप इस निबंध को ध्यान से और मन लगाकर पढ़ें और समझें। यहां पर दिया गया निबंध कक्षा (For Class) 5th, 6th, 7th, 8th, 9th, 10th और 12th के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त हैं। विद्यार्थी बोर्ड परीक्षा और प्रतियोगिताओं के लिए इस निबंध से मदद ले सकते हैं।

राष्ट्रीय झंडा (राष्ट्रीय ध्वज) पर निबंध

[प्रारंभ, इतिहास, व्याख्या, महत्ता, उपसंहार ]

प्रत्येक स्वाधीन राष्ट्र का एक झंडा होता है। यह उस राष्ट्र की प्रकृति और प्रगति का प्रतीक होता है। यह देश का पूज्य प्रतिनिधि होता है। प्राचीन काल से ही राष्ट्रीय झंडे का प्रचलन रहा है। रघु ने दिग्विजय कर अपना झंडा लहराया था। श्रीराम ने भी रावण का विनाश कर स्वर्णपुरी लंका पर अपनी पताका फहराई थी। कामदेव के । ‘मीनकेतन’ तथा अर्जुन के ‘कपिध्वज’ से हम सुपरिचित हैं।

स्वतंत्रता के पहले स्वाधीनता-आंदोलन के प्रतिनिधि तिरंगे झंडे के मध्य चर्खे का चिह्न था। चर्खा भारतवर्ष के गृह-उद्योग एवं श्रमिकवर्ग का प्रतीक है। स्वाधीनता-आंदोलन में हम राजनीतिक विचार और दल के लोग काँग्रेस-जैसे संयुक्त मोर्चे के अंदर थे।

स्वाधीनता पाने के बाद अपने-अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए सब दल काँग्रेस से अलग हो गए! तब राष्ट्र के झंडे का विचार आया, क्योंकि काँग्रेस ने अपना झंडा वही तिरंगा चर्खेवाला रखा। निर्णय लिया गया कि राष्ट्रीय झंडे में चर्खे की जगह अशोकचक्र रखा जाय और अशोकस्तंभ को राष्ट्रीय प्रतीक किया जाय। तब से अशोकचक्रवाला झंडा ही राष्ट्रीय झंडा है।

आज बहुत कम लोग यह बतलाने में समर्थ होंगे कि इस राष्ट्रध्वज के रंगों की कल्पना सर्वप्रथम किसके मानस में उठी थी। मुंबई की महान देशसेविका श्रीमती भीकाजी कामा ने अगस्त 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट के विशाल समाजवादी-सम्मेलन में बोलते हुए अपनी साड़ी का पल्ला फाड़कर उसे भारतीय स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में फहरा दिया था।

केसरिया रंग की पृष्ठभूमि में अष्टतारकवाले राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण का विचार उन्हीं के मन में पहली बार उठा था। उसके बाद इसपर भारतवर्ष में विचार-विमर्श होता रहा और क्रमशः स्वाधीनता आंदोलन का चर्खावाला तिरंगा और तदनंतर अशोकचक्रवाला तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज हमारे समक्ष आया।

संसार में जितने स्वतंत्र राष्ट्र हैं, सबका अपना झंडा है। इन झंडों के रंगों और प्रतीकों के अंकन में बहुत अंतर है। किसी के झंडे पर तीन धारियाँ हैं, तो किसी पर तेरह; किसी के ऊपर एक तारकचिह्न है, तो किसी के ऊपर अड़तालीस; किसी के मध्य गजराज अंकित है, तो किसी के ऊपर क्रुद्ध व्याघ्र। इन धारियों, उनके रंगों तथा उनपर चित्रित प्रतीकों के अलग-अलग अर्थ हैं। ये झंडे | किसी भी देश की प्रकृति, उसकी सभ्यता और संस्कृति के स्मारक हैं।

भारतीय राष्ट्रध्वज में तीन रंग हैं-ऊपर केसरिया, मध्य में उजला तथा नीचे हरा। उजली पट्टी में गाढ़े नीले रंग का चक्र बना हुआ है, जिसमें चौबीस अरे (तीलियाँ) हैं। हमारा राष्ट्रध्वज हमारी प्रकृति और संस्कृति, हमारे संघर्ष और बलिदान, हमारी इच्छाओं और आशाओं का मूर्तरूप है। इस ध्वज-निर्माण में जो तात्पर्य निहित है, वह हमारी उच्चाशयता एवं विलक्षण भावनाओं को विश्व के राष्ट्रों में अनुपम बना देता है।

हमारे ध्वज में प्रयुक्त विभिन्न रंगों तथा अंकित चक्र-चिह्न की अनेक व्याख्याएँ प्रस्तुत की गयी हैं। केसरिया रंग उत्साह और त्याग, उजला रंग सत्य और शांति तथा हरा रंग वीरता और प्रसन्नता का प्रतीक माना गया। डॉ. राधाकृष्णन ने हरे रंग को भौतिकवादी सभ्यता में हमारे प्रकृति-प्रेम का द्योतक माना है। एक कवि ने लिखा है —

केसरिया बल भरनेवाला, सादा है सच्चाई।
हरा रंग है हरी हमारी धरती की अंगड़ाई।।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने हरे रंग को कर्म, उजले रंग को ज्ञान तथा केसरिया रंग को बलिदान और भक्ति का दिग्दर्शक माना है। इन तीन रंगों का मिलन क्या है — गंगा, यमुना और सरस्वती का संगमस्थल तीर्थराज प्रयाग! हम इस झंडे के द्वारा समस्त संसार को मुक्ति का संदेश देना चाहते हैं।

कर्मक्षेत्र हरा है अपना, ज्ञान शुभ्र मनमाना।
बलि बलवती विनीत भक्ति का कल केसरिया बाना।
इस त्रियोग के तीर्थराज में हमें स्वधर्म निभाना।
अपनी स्वतंत्रता से सबका मुक्तिमंत्र है पाना।

इस ध्वज के मध्य जो चक्र है वह हमारी जय, विश्वमैत्री और जीवों के प्रति करुणा का प्रतीक है। यह चक्र कभी तो उथल-पुथल मचानेवाला क्रांति का सूरज बन जाता है और कभी शांति बरसानेवाला चंद्रमा। यह विष्णु के सुदर्शन-चक्र की तरह आक्रमणों से हमारी रक्षा करता है। यह वह समय-चक्र है जो हमारे लक्ष्यों की संपूर्ति करता है—

जय-मैत्री-करुणा-धारामय यह ध्वज-चक्र हमारा;
कभी क्रांति का सूर्य यही है, कभी शांति-शशि-तारा;
हमें विजय का सूत्र मिला है, इसी चक्र के द्वारा;
रक्षक यही सुदर्शन अपना किरण-कुसुम-सा प्यारा;
काल-चक्र यह हाथ हमारे, लक्ष्य क्यों न थक थहरे!

जिस राष्ट्रध्वज के लिए लाखों नौजवानों ने कुर्बानी की तथा लाखों रमणियाँ अनाथ हुईं, उसकी मर्यादा की रक्षा हमारा पुनीत कर्तव्य है। हमें इसे किस प्रकार, कहाँ, कब और कैसे फहराना चाहिए, इसका पूरा ज्ञान होना चाहिए। राष्ट्रीय झंडे को जमीन पर बिछाना ठीक नहीं, इसे गंदा करना उचित नहीं है।

जिस किसी के लिए इसे झुकाना भी नहीं चाहिए। इसे सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराना चाहिए। रात में और आँधी में इसे उतार लेना चाहिए। जब यह फहराया जाय और राष्ट्रगीत या ध्वजवंदना हो, तो हमें स्थिर सावधान खड़ा हो जाना चाहिए। यह हमारे लिए देवतुल्य है और इसके प्रति हमारा पूज्यभाव होना चाहिए।

हमारा राष्ट्रीय झंडा संपूर्ण राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। यह भारत-माता के स्नेहपूर्ण आँचल की तरह परम पवित्र है। यह राष्ट्र का मंगलदीप है, भारत के पुंजीभूत पौरुष का परमोज्ज्वल प्रकाश है। इसे फहराते समय जन-गण-मन-अधिनायक जय हे, भारत भाग्य-विधाता’ राष्ट्रगान का महोच्चार ही हमारी राष्ट्रभक्ति का मंत्र है। पर्वत की ऊँचाइयों पर मचलनेवाला, आँधियों की छातियों पर नाचनेवाला यह ध्वज राष्ट्र की आराधना का स्वर्णिम वर्ण-विन्यास है। अतः, इसे हमारा शत नमन है —

राष्ट्र की आराधना के वर्ण के विन्यास, शत नमन मेरा तुम्हें!

Mukul Dev

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।