Essay On Paropkar in Hindi | परोपकार पर निबंध 2022

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आज का यह निबंध परोपकार पर निबंध (Essay On Paropkar in Hindi) दिया गया हैं। आप इस निबंध को ध्यान से और मन लगाकर पढ़ें और समझें। यहां पर दिया गया निबंध कक्षा (For Class) 5th, 6th, 7th, 8th, 9th, 10th और 12th के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त हैं। विद्यार्थी परीक्षा और प्रतियोगिताओं के लिए इस निबंध से मदद ले सकते हैं।

 

Essay On Paropkar in Hindi

भूमिका– मनुष्य में दो प्रवृत्तियों पाई जाती हैं-स्वार्थ और परमार्थ या परोपकार। स्वार्थ के वशीभूत हो मनुष्य अपना ही हित साधन करता है और परमार्थ वाले दूसरों का कल्याण करते हैं। इसे ही वास्तविक धर्म कहा गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी का उल्लेख किया है। सच तो यह है कि प्रत्येक धर्मग्रंथ में परोपकार को महत्त्व दिया गया है। पशु-पक्षी अपने लिए जीते हैं। मैथिलीशरण गुप्त इसी बात को कहते हैं।

“यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आपही चरे। वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।”

तात्पर्य यह कि परोपकार ही मानव-धर्म है।

 

परोपकार है क्या – परोपकार का अर्थ है दूसरे । की भलाई, संकट के समय दूसरे की सहायता। इस प्रकार, भूखे को अन्न देना, प्यासे को पानी, बीमार की सेवा करना, अंधे को राह बताना और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना परोपकार के रूप हैं।

सच कहिए तो प्रकृति भी परोपकार करती है। नदियाँ दूसरों को पानी पिलाती है, वृक्ष दूसरों को फल और छाया देते हैं, धरती अन्न लुटाती है, सूरज जलकर दूसरों को रोशनी और ऊर्जा देता है, चन्द्रमा शीतलता बिखेरता है और रात अपनी गोद में सुलाती है। ये सभी हमें परोपकार की प्रेरणा देते हैं।

 

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वस्तुतः पूजा-पाठ करना, मंदिरों में घंटे बजाना, तीर्थ-व्रत करना ही धर्म नहीं है, धर्म दूसरों की मदद करना है। हम सभी ईश्वर की संतान हैं, इसलिए जो भी ईश्वर की संतप्त संतान की सहायता करता है, वह धर्म करता है। उसे परलोक के साथ-साथ इस लोक में भी सम्मान मिलता है, वह वंदनीय हो जाता है।

परोपकार के कारण ही सिद्धार्थ गौतम बने, ईसा वंदनीय हैं, सुकरात पूज्य हैं और मोहनदास करमचन्द गाँधी महात्मा हैं। कहा है आदमी लाख संभलने पर गिरता है, मगर जो दूसरों का भला करता है, उसका भला अपने-आप होता है-ठीक वैसे ही जैसे मेंहदी बाँटने वाले के हाथ अपने आप रंगीन हो जाते हैं। परोपकारी की आत्मा का विस्तार होता है, हृदय मक्खन की तरह हो जाता है और उसकी छवि चेहरे पर छिटकती है, दूसरी ओर स्वार्थी मनुष्य का चेहरा और आँखें उसकी अन्दरुनी कहानी कहती हैं।

 

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आज संसार परेशान क्यों है? स्वार्थवश ही चारों ओर लट मची है हत्याएं हो रही हैं, युद्ध हो रहे हैं। निरंतर तनाव से मनुष्य नाना प्रकार की व्याधियों का शिकार हो रहा है। अगर संसार को सुख से जीना है तो स्वार्थी प्रवृत्ति छोड़कर परोपकार भावना अपनानी होगी। पंतजी की कामना सही है-

“आज त्याग तप संचय साधन सार्थक हो पूजन आराधन,”
(समरूप निबंध-परहित सरिस धर्म नहीं भाई)

परोपकार पर लिखा हुआ यह निबंध (Essay Paropkar In Hindi) आप अपने स्कूल या फिर कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए प्रयोग में ला सकते है। आपको हमारे इस वेबसाइट पर और भी महत्वपूर्ण विषयो पर हिंदी में निबंध मिलेंगे, जिन्हे आप पढ़ सकते है। पोस्ट अच्छी और ज्ञान पूर्वक लग रहा है तो शेयर करे और कमेन्ट में बताये की कैसी लगी।

Mukul Dev

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।