Gajanan Madhav Muktibodh ki Jivini | गजानन माधव मुक्तिबोध की जीवनी

गजानन माधव मुक्तिबोध
जन्म 13 नवंबर 1917
निधन 11 सितंबर 1964
जन्म-स्थान श्योपुर, ग्वालियर, मध्य प्रदेश
माता-पिता पार्वती बाई एवं माधवराज मुक्तिबोध
शिक्षा उज्जैन, विदिशा, अमझरा, सरदारपुर आदि स्थानों पर प्रारंभिक शिक्षा ।

1930 में उज्जैन के माधव कॉलेज से ग्वारियर बोर्ड की मिडिल परीक्षा में असफल ।

पुन: 1931 में सफलता प्राप्त । 1935 में माधव कॉलेज से इंटरमीडिएट ।

1937 में इंदौर के होल्कर कॉलेज से बी० ए० में असफल ।

पुनः 1938 में सफलता प्राप्त । 1953 में नागपुर विश्र वद्यालय से हिंदी में एम० ए०

वृत्ति 20 वर्ष की छोटी उम्र में बड़नगर मिडिल स्कूल से मास्टरी आरंभ । तत्पश्चात शुजालपुर, उज्जैन, कोलकाता, इंदौर, मुंबई, बंगलौर, बनारस, जबलपुर आदि स्थानों पर भिन्न-भिन्न नौकरियाँ-मास्टरी से वायुसेना, पत्रकारिता से पार्टी तक । 1948 में नागपुर आए । नागपुर के प्रकाशन तथा सूचना विभाग में पत्रकार के रूप में अक्टूबर 1948 से सितंबर 1965 तक रहे । फिर नागपुर में ही रेडियो के हिंदी प्रादेशिक सूचना विभाग में अक्टूबर 1954 से अक्टूबर 1956 तक रहे । 1956 में ही नागपुर से निकलने वाले पत्र ‘नया खून’ का संपादन । 1958 में ‘नया खून’ से मुक्त हो गए । अंतत: 1958 से दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगाँव में प्राध्यापक ।
अभिरुचि अध्ययन-अध्यापन, लेखन-पत्रकारिता-राजनीति की नियमित-अनियमित व्यस्तता के बीच
कृतियाँ तार सप्तक’ के एक कवि । चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल (कविता संग्रह) । काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी (कथा साहित्य) ।

कामायनी: एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, जिसका नया संस्करण अब कुछ परिवर्तित रूप में ‘आखिर रचना क्यों?’ नाम से प्रकाशित, समीक्षा की समस्याएँ, एक साहित्यिक की डायरी (आलोचना) तथा भारत : इतिहास और संस्कृति (इतिहास)। मुक्तिबोध रचनावली (6 खंडों में) नेमिचंद्र जैन के संपादन में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ।

गजानन माधव मुक्तिबोध बीसवीं शती के उत्तरार्ध के हिंदी के प्रमुख कवि, चिंतक, आलोचक और कथाकार हैं । उनका जन्म मध्य प्रदेश में हुआ था किंतु वे मराठी थे । हिंदी साहित्य में उनका उदय प्रयोगवाद के एक कवि के रूप में हुआ था । अज्ञेय के द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ के एक कवि के रूप में वे सामने आए थे, किंतु शीघ्र ही अपने कठिन जीवन तथा रचना संघर्ष के कारण उन्होंने अपना पथ अलग और स्वतंत्र कर लिया ।

 

वे अपने रचनात्मक जीवन में युग की दो प्रधान वैश्विक विचारधाराओं अस्तित्ववाद एवं मार्क्सवाद के संसर्ग में आए और विकट वैचारिक एवं रचनात्मक संघर्षों की प्रक्रिया से गुजरते हुए एक सच्चे मार्क्सवादी बनकर निखरे । यह सच है कि कोई भी जागरूक, सत्यान्वेषी एवं जीवंत लेखक अपने समय की प्रमुख विचारधाराओं और भावधाराओं से विलग या तटस्थ नहीं रह पाता और मुक्तिबोध भी इसके अपवाद नहीं थे; किंतु वे अपनी प्रकृति और संवेदना से ही अथक सत्यान्वेषी, ज्ञान पिपासु तथा साहसी खोजी थे ।

 

उनकी प्रकृति और संवेदना ही उन्हें उक्त विचारधाराओं के निकट ले गई थी । उनमें बौद्धिक और नैतिक पराक्रम कूट-कूटकर भरा हुआ था । स्वभावतः इन विचार दर्शनों के आगे उन्होंने तुरंत घुटने नहीं टेक दिए, अपनी गर्दन नहीं डाल दी; उनसे अपने प्रश्नों और आपत्तियों के साथ अनवरत संघर्ष किया और इस संघर्ष के बाद मार्क्सवाद को अपनी आस्था के रूप में उपार्जित किया । यही कारण है कि उनके साहित्य में कोई विचारधारा या दर्शन निरा अनुवादित नहीं दिखता, वह कवि के अपने विचारदर्शन-जिसका उसने ज्ञान, अनुभव और संवेदन के द्वारा अपने ढंग से विकास किया हो-की तरह प्रतीत होता है ।

 

मुक्तिबोध के जीवन और साहित्य में कोई फाँक नहीं दिखाई पड़ती । उनका जीवन और साहित्य दोनों अक्स-बर-अक्स और एक दिखाई पड़ते हैं। स्वभावत: जीवन मूल्य और रचना मूल्य भी एक हैं। मुक्तिबोध ने अपने जीवन से ही रचना की कीमत चुकाई । इस लिहाज से उनकी तुलना के लिए हिंदी में एक ही कवि हैं-निराला । मुक्तिबोध निराला की ही तरह अपनी पीढ़ी के महान क्रांतिकारी कवि हैं। उन्होंने कविताएँ लिखीं, कहानियाँ लिखीं, डायरी, आलोचना और एक उपन्यास भी लिखा, किंतु ये सभी साहित्य रूप और विधाएँ अपने परंपरागत ढाँचे का अतिक्रमण करती हैं।

 

अतिक्रमण मुक्तिबोध के विलक्षण अनुभव और कथ्य के कारण हुआ है । उनका अध्ययन, पर्यवेक्षण, अनुभव, संवेदन और यथार्थ बोध असाधारण और अद्वितीय है । वे यथार्थ की सुपरिचित चालू सतह को अपनी प्रखर रचनात्मक अंतर्दृष्टि से भेदकर एक ऐसी समग्रता में पकड़ते हैं कि पाठक हतप्रभ रह जाता है । यही कारण है कि उनकी दृष्टि तथ्यों के वर्तमान तक ही सीमित न रहकर उनके अदृष्ट अतीत और अलक्ष्य भविष्य तक भी पहुंचती यहाँ उनकी एक अपेक्षाकृत आरंभिक दौर की ऐसी कविता दी जा रही है जो कथ्य और संप्रेषण की दृष्टि से कम जटिल और सुगम है ।

 

उन्होंने प्रायः लंबी कविताएँ ही लिखी हैं । यह कविता तुलनात्मक रूप से कम लंबी है। इस कविता में कवि की दृष्टि और संवेदना वैश्विक और सार्वभौम दिखाई पड़ती है। कवि पीड़ित और संघर्षशील जनता का, जो अपने मानवोचित अधिकारों के लिए कर्मरत है, चित्र प्रस्तुत करता है ।

यह जनता दुनिया के तमाम देशों में संघर्षरत है और अपने कर्म और श्रम से न्याय, शांति, बंधुत्व की दिशा में प्रयासरत है । कवि इस जनता में एक अंतर्वर्ती एकता देखता है और इस एकता को कविता का कथ्य बनाकर संघर्षकारी संकल्प में प्रेरणा और उत्साह का संचार करता है।

9 जमाने भर का कोई इस कदर अपना न हो जाए, कि अपनी जिंदगी खुद आपको बेगाना हो जाए ! चमन खिलता था, तू खिलता था; और वो खिलना कैसा थाकि जैसे हर कली से दर्द का याराना हो जाए इधर मैं हूँ; उधर मैं हूँ; अजल तू बीच में क्या है ? फकत एक नाम है, यह नाम भी धोखा न हो जाए। -शमशेर (मुक्तिबोध के लिए)

Mukul Dev

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।