Jay Prakash Narayan Biography Hindi

Jay Prakash Narayan Biography Hindi | जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय

पूरा नाम जयप्रकाश नारायण
जन्म 11 अक्टूबर 1902
निधन 8 अक्टूबर 1979
जन्म-स्थान सिताब दियारा गाँव (उत्तर प्रदेश के बलिया और बिहार के सारण जिले में फैला)
पुकार का नाम बचपन में बाउल और बड़े होने पर जेपी नाम से प्रसिद्ध, अपनी जनपक्षधरता के लिए ‘लोकनायक’ के रूप में प्रसिद्ध।
माता-पिता फूलरानी एवं हरसूदयाल
पत्नी  प्रभावती देवी (प्रसिद्ध गाँधीवादी राजकिशोर प्रसाद की पुत्री)
शिक्षा आरंभिक शिक्षा घर पर ही पूरा किया, फिर घटना कॉलेजिएट, पटना में दाखिल हुए, वहीं ‘बिहार में हिंदी की वर्तमान स्थिति’ विषय पर लेख के लिए सर्वोच्च पुरस्कार प्राप्त किया। इसके बाद पटना कॉलेज, पटना में प्रवेश।

असहयोग आंदोलन के दौरान शिक्षा अधूरी छोड़ी। 1922 में शिक्षा प्राप्ति के लिए अमेरिका गए। वहाँ कैलिफोर्निया, बर्कले, विस्किंसन-मैडिसन आदि कई विश्वविद्यालयों में अध्ययन किये। मासवाद और समाजवाद की शिक्षा यहीं ग्रहण की। माँ की अस्वस्थता के कारण पीएच०डी० न कर सके और अपने देश लौट आए

कृतिया  रिकंस्ट्रक्शन ऑफ इंडियन पॉलिटी, कुछ कविताएँ भी लिखीं और डायरी एवं निबंध भी प्रकाशित।
राजनीतिक जीवन 1929 में कांग्रेस में शामिल हुए, 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जेल गए। जेल से बाहर निकलकर काँग्रेस के अंदर ही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ के गठन किए। 1939, 1943 में भी जेल गए, 1942 के आंदोलन से विशेष प्रसिद्धि मिली।

आजादी के बाद 1952 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के गठन में योगदान। धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया । 1954 में विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन से जुड़े । 1974 में छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया और आपातकाल के दौरान जेल गए । इनके मार्गदर्शन में ही जनता पार्टी का गठन हुआ।

पुरस्कार/सम्मान 1963 में, “लोकनायक” उपाधि देते हुए “रेमन मैगसेसे” पुरस्कार। 1999 में, मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया

Jay Prakash Narayan Biography Hindi

जयप्रकाश नारायण बोसवीं शती में भारत के एक प्रमुख समाजवादी विचारक, क्रांतदर्शी नेता, समर्पित समाजकनी तथा विद्रोही स्वाधीनता सेनानी थे । उनका अध्ययन विशाल और वैविध्यपूर्ण था; राजनीति, संगठन कर्म और लोकसेवा का अनुभव व्यापक और गहन था। भारतीय जनता में उनकी स्थाई विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा थी।

 

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निष्ठा और अध्यवसाय से परिपूर्ण अपने सक्रिय, रचनात्मक, सार्वजनिक जीवन में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रतिष्ठा कमाई । ये अपने समय में विश्व के कुछ चुने हुए लोकतांत्रिक नेताओं में से एक थे। विदेश से अपनी शिक्षा पूरी कर लौटने के बाद उन्होंने स्वाधीनता संघर्ष में अपने को झोंक दिया । स्वाधीनता संघ र उनकी भूमिका क्रॉगधर्मी थी ।

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद उन्होंने सत्ताकेंद्रित राजनीति के बदले अपने लिए लोककेंद्रित रचनात्मक राजनीति और समाज सेवा का मार्ग चुना।उन्होंने समता, न्याय, सामाजिक परिवर्तन और लोकतंत्र के पक्ष में पत्रकारिता की तथा लोकसेवा के अनेक कार्यक्रम और अभियान चलाए। पड़ोसी देश नेपाल में लोकशाही के लिए हुए संघर्ष में भी उनका योग रहा । गाँधीवाद के संसर्ग में आकर उन्होंने अपनी लोकनिष्ठा अधिक सुदृढ़ की तथा विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में उल्लेखनीय रचनात्मक भूमिका निभाई।

 

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साठ के दशक में अपनी ईमानदारी, त्याग और नि:स्वार्थ लोकसेवा के कारण जनता के बीच अर्जित अपनी विश्वसनीयता के चलते उन्होंने डाकुओं के हृदय परिवर्तन और पुनर्वास को लेकर उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की। आगे जब देश में आपातकाल लागू हुआ और जनतांत्रिक अधिकारों का क्रूरतापूर्वक दमन किया जाने लगा तब बिहार, गुजरात सहित समूचे देश में छात्रों और युवाओं का आक्रोश फूट पड़ा। छात्रों और युवाओं के ही अनुरोध पर बढापा और बीमारी के बावजूद जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया । तब आंदोलन ने देखते ही देखते राष्ट्रव्यापी संगठित रूप धारण किया ।

 

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जयप्रकाश नारायण ‘लोकनायक’ कहकर पुकारे गए और वे युवाशक्ति के प्रतीक तथा युवाओं के हृदय सम्राट बन गए । उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया और सुविचारित राजनीतिक-सामाजिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए उनपर अमल करने की व्यापक अपील की । उसका जबर्दस्त असर पड़ा । देश में सत्ता परिवर्तन हो गया । किंतु ‘संपूर्ण क्रांति’ का लक्ष्य अभी दूर था। सत्ता परिवर्तन उसका प्रारंभिक चरण भर था । आगे व्यापक सामाजिक कार्यक्रम थे जिन्हें अनवरत संगठित प्रयासों द्वारा ही पूरा किया जा सकता था।

 

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जयप्रकाश नारायण बुरी तरह अस्वस्थ हो सुके थे। शीघ्र ही पटना में उनका अवसान हो गया। सत्ता बदल गई थी किंतु संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य सत्ताधारी नेताओं और दलों के आपसी कलह और खींचतान में दूर हुआ चला जा रहा था। कुछ लोककर्मी संगठनों और शक्तियों द्वारा अथक रूप से आज भी इस दिशा में आगे बढ़ते हुए कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। जरूरत है इस दिशा में बड़े पैमाने पर जनसंरक्षण के साथ अभियान चलाने की।

 

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यहाँ 5 जून 1974 के पटना के गांधी मैदान में दिए गए जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ वाले ऐतिहासिक भाषण का एक अंश प्रस्तुत है। संपूर्ण भाषण स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में ‘जनमुक्ति’ पटना से प्रकाशित है। इस संकलित अंश से उसकी एक छोटी सी झलक भर मिलती है किंतु लाखों लाख की संख्या में संपूर्ण प्रदेश और देश के विविध क्षेत्रों से आए लोगों, विशेषकर युवा वर्ग, के उस ऐतिहासिक जन-सम्मर्द के बीच लोकनायक ने अस्वस्थ दशा में भी शांतिपूर्वक अपनी बातें कहीं और संपूर्ण जनता मंत्रमुग्ध होकर सुनती रही । भाषण के बाद लोगों के हृदय में क्रांतिकारी विचार धधक उठे और आंदोलन ने विराट रूप धारण कर लिया । पटना के गांधी मैदान में फिर न वैसी भीड़ इकट्ठी हुई और न वैसा कोई प्रेरक भाषण और पुरअसर जनसंवाद कायम हो सका ।।