Mohan Rakesh Biography Hindi | मोहन राकेश की जीवनी

मोहन राकेश की संक्षिप्त जीवनी 

जन्म 8 जनवरी 1952
निधन 3 दिसम्बर 1972
जन्म – स्थान  जंडीवाली गली, अमृतसर, पंजाब
बचपन का नाम  मदन मोहन गुगलानी
माता -पिता  बच्चन कौर एवं करमचंद गुगलानी (पेशे से वकील, साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़ाव)
शिक्षा  एम० ए० (संस्कृत) लाहौर। ओरिएंटल कॉलेज, जालंधर से एम० ए० (हिंदी)
वृति  दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन। ‘सारिका’ के कार्यालय में नौकरी। 1947 के आस-पास एलफिंस्टन कॉलेज, मुंबई में हिंदी के अतिरिक्त भाषा प्राध्यापक

कुछ समय तक डी० ए० वी० कॉलेज, जालंधर में प्रवक्ता। 1960 में दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक। 1962 में ‘सारिका’ के संपादक। अंत में मृत्युपर्यंत स्वतंत्र लेखन।

कृतियाँ  इंसान के खंडहर (1950), नए बादल (1957), जानवर और जानवर (1958), एक और जिंदगी (1961), फौलाद का आकाश (1972), वारिस (1972) सभी कहानी संग्रह।

अँधेरे बंद कमरे (1961), न आनेवाला कल (1970), अंतराल (1972) – सभी उपन्यास। आषाढ़ का एक दिन (1958), लहरों के राजहंस (1963), आधे अधूरे (1969)- सभी नाटक।

पैर तले की जमीन, अंडे के छिलके और अन्य एकांकी (1973) – सभी एकांकी।

आखिरी चट्टान तक (यात्रा वृत्तांत)। परिवेश, रंगमंच और शब्द, कुछ और अस्वीकार, नई निगाहों के सवाल, बकलम खुद (लेख-निबंध)। मृच्छकटिकम्, अभिज्ञानशाकुंतलम्, एक औरत का चेहरा (अनुवाद)। समय सारथी (जीवनी संकलन)। मोहन राकेश की डायरी (निधनोपरांत प्रकाशित)

शोध कार्य नाटक में सही शब्द की खोज’ विषय पर नेहरू फेलोशिप के अंतर्गत कार्य पूरा नहीं कर पाए।

Mohan Rakesh Biography Hindi

मोहन राकेश ‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षर थे। वे बीसवीं शती के उत्तरवर्ती युग के प्रमुख कथाकार एवं नाटककार थे। कथा साहित्य के अंतर्गत उन्होंने कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं। नाटक के क्षेत्र में तो वे जयशंकर प्रसाद के बाद की सबसे बड़ी प्रतिभा माने जाते हैं। आधुनिक हिंदी नाटक और रंगमंच की युगांतरकारी प्रतिभा के रूप में वे अखिल भारतीय ख्याति अर्जित कर चुके हैं। हिंदी का आधुनिक रंगमंच उन्हें अपना प्रमुख प्रेरणा पुरुष मानता है।

वे रंगकर्मी, अभिनेता या रंगनिर्देशक नहीं थे, महज नाटककार थे; किंतु उनके नाटकों की परिकल्पना डोस, जटिल और आधनिक रंग संकल्पना को सर्जनात्मक रूप से उत्तेजित करनेवाली थी कि आधनिक रंगमंच का हिंदी में जो नवीन संघटन-संयोजन हुआ उस पर मोहन राकेश की निर्णायक छाप पड़ी। इतना ही नहीं, हिंदी में उनके समकालीनों में अनेक लोगों ने आधुनिक विषयवस्तु, कथ्य और रंग-ढंग के जो नाटक लिखे उनके पीछे इस क्षेत्र में अपने कार्यों से मोहन राकेश द्वारा लाई गई हलचल की प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रेरणा है।

नाटक मुख्यतः मंच पर दृश्याभिनय के लिए ही लिखा जाना चाहिए और उसका प्रभाव केवल लिखे हुए शब्दों पर नहीं बल्कि अभिनेताओं के व्यक्तित्व, स्वर और अभिनय कुशलता पर, रंगमंच की सजावट और प्रकाश पर तथा अभिनेता एवं दर्शक के साक्षात्कार से उत्पन्न होनेवाले विशेष वातावरण पर निर्भर होना चाहिए।

नाटक का लिखित रूप बहुत महत्त्वपूर्ण है, किंतु दृश्याभिनय का संपूर्ण प्रभाव देनेवाले अनेक उपकरणों में से वह केवल एक उपकरण है। इन सचाइयों को मोहन राकेश ने अपने दृष्टिपथ और चिंताकेंद्र में रखा और नए ढंग के नाटकों की रचना की। वे अपने असामयिक निधन के समय तक नाटक और रंगमंच की संश्लिष्ट भूमि से जुड़ी समस्याओं को लेकर शोधरत थे।

उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में पश्चिमी देशों में आधुनिक नाटकों का जन्म और विकास हुआ। तब से लेकर अब तक यूरोप और अमेरिका में नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में विपुल प्रयोग हुए। इससे नाटक और मंच दोनों ही क्षेत्रों में युगांतरकारी परिवर्तनों के अनेक चरण घटित हुए।

मोहन राकेश इस विश्वपरंपरा को अपने ढंग से आत्मसात करते हुए आगे बढ़े। उनके नाट्यलेखों में मंचसज्जा या दृश्यबंध, वेशभूषा, रूपसज्जा, रंग-संगीत और प्रकाश-इन सबकी चेतना बराबर रहती आई है। उन्होंने हिंदी नाटक को अँधेरे बंद कमरों से बाहर निकालकर युगों के रोमानी ऐंद्रजालिक सम्मोहन से उबारा तथा एक नए दौर के साथ उसे जोड़कर दिखाया।

यहाँ प्रस्तुत एकांकी उनकी पुस्तक ‘अंडे के छिलके तथा अन्य एकांकी’ से ली गई है। एकांकी, जैसा नाम से ही स्पष्ट है, एक अंक की बहुत छोटी रचना है और उसकी तुलना प्राय: कहानी से की जाती रही है । मोहन राकेश की इस मार्मिक रचना में निम्न मध्यवर्ग की एक ऐसी माँ-बेटी की कथावस्तु प्रस्तुत है जिनके घर का इकलौता लड़का सिपाही के रूप में द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चे पर बर्मा में लड़ने गया है । वह अपनी माँ का इकलौता बेटा और विवाह के लिए तैयार अपनी बहन का इकलौता भाई है । उसी पर घर की पूरी आशा टिकी हुई है।

वह लड़ाई के मोर्चे से कमाकर लौटे तो बहन के हाथ पीले हो सकें। माँ एक देहाती भोली स्त्री है, वह यह भी नहीं जानती कि बर्मा उसके गाँव से कितनी दूर है और लड़ाई कैसी और किनसे किसलिए हो रही है। उसका अंजाम ऐसा भी हो सकता है कि सबकुछ खत्म हो जाए-ऐसा वह सोच भी नहीं सकती।

माँ और छाया की तरह उससे लगी बेटी के भीतर की वह आशा जो बेटे से जुड़ी हुई है अनेक रूप-रंग ग्रहण करती है । उसकी संपूर्ण नाटकीयता और रंग संभावनाओं का लेखक ने सधे हाथों ऐसा उद्घाटन किया है कि रचना के अंत में एक अपार विषाद मन पर स्थाई प्रभाव छोड़ जाता है।

“तू हवा और पानी का साथी है, उनके साथ मिलकर उनकी तरह ही जी-जीवन में ख्याति या प्राप्ति तेरी उपलब्धि नहीं है। तेरी उपलब्धि तेरी खोज है। खोज और जी।” – मोहन राकेश

Mukul Dev

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।