Raghuvir Sahay Biography Hindi | रघुवीर सहाय का जीवनी

Raghuvir Sahay Biography Hindi

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Raghuvir Sahay Biography in Hindi

पूरा नाम रघुवीर सहाय
जन्म 9 दिसंबर 1929
निधन 30 दिसंबर 1990
जन्म-स्थान लखनऊ, उत्तरप्रदेश
 माता -पिता हरदेव सहाय (एक शिक्षक)
शिक्षा एम० ए० (अंग्रेजी), लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ
वृति पत्रकारिता । ‘नवजीवन’ (लखनऊ) से आरंभ, फिर ‘समाचार विभाग’ आकाशवाणी, नई दिल्ली और फिर ‘नवभारत टाइम्स’ (नई दिल्ली) में विशेष संवाददाता ।

1979 से 1982 तक ‘दिनमान’ समाचार-साप्ताहिक (नई दिल्ली) के प्रधान संपादक । भारतीय प्रेस परिषद् के सदस्य भी रहे।

गतिविधि अपनी और समकालीन कविता के वाचन के लिए ‘क नामक कविता केंद्र की स्थापना और संचालन
विशेष अभिरुचि संगीत सनना और फिल्में देखना
कृतियाँ
  • कविता : ‘दूसरा सप्तक’ में एक कवि के रूप में शामिल, सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो-हँसो जल्दी हँसो, लोग भूल गए हैं, कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ।
  • कहानियाँ : सीढ़ियों पर धूप में, रास्ता इधर से है, जो आदमी हम बना रहे हैं।
  • निबंध : सीढ़ियों पर धूप में, दिल्ली मेरा परदेस, लिखने का कारण, ऊबे हुए सुखी, वे और नहीं होंगे जो मारे जाएंगे, यथार्थ यथास्थिति नहीं। इसके अतिरिक्त अनुवाद कार्य भी। संपूर्ण रचनावली छह खंडों में ‘राजकमल प्रकाशन’ नई दिल्ली से प्रकाशित।
सम्मान लोग भूल गए हैं’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार

Raghuvir Sahay Biography in Hindi

स्वतंत्रता के बाद की भारत की बहुदलीय संसदीय राजनीति तथा एक पिछड़े सामंती सामाजिक ढाँचे में लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रतिष्ठा और विकास के सामाजिक राजनीतिक परिवेश में रघुवीर सहाय का रचनाकर्म और पत्रकारिता अपना रूपाकार ग्रहण करते हैं ।

रघुवीर सहाय बीसवीं शती के उत्तरार्ध के एक प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण कवि तथा पत्रकार हैं जिनके रचनाकर्म और पत्रकारिता का आगे की पीढ़ियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा । उन्होंने कहानियाँ भी लिखो हैं और वे अनेक कारणों से बहुमूल्य मानी जाती हैं । इसके अतिरिक्त रघुवीर सहाय ने विश्व साहित्य से अनेक कृतियों का, विशेष रूप से नाट्य, कथा आदि विधाओं की कृतियों का हिंदी में अनुवाद भी किया है जो उनके रचनाकर्म का ही एक अनिवार्य अंग है।

रघुवीर सहाय छठे दशक के प्रारंभ में ही अज्ञेय द्वारा संपादित प्रयोगवादी संकलन ‘दूसरा सप्तक’ में एक कवि के रूप में सामने आए थे । अज्ञेय के सप्तकों और प्रयोगवाद की सबसे बड़ी भूमिका यह है कि छायावाद आदि पिछले काव्य आंदोलनों के बचे-खुचे प्रभावों और संस्कारों से नए प्रयोगों द्वारा पूरी तरह मुक्त होकर कविता की अग्रगति और विकास के लिए नई रचनाभूमि, नई भाषा, मुहावरा और रचनातंत्र की उद्भावना की शुरुआत हुई।

सप्तकों और प्रयोगवाद के द्वारा वास्तविक अर्थों में समक्त रूप से नई कविता की पीठिका रची जा सकी तथा नए साहित्य चिंतन और रचना-उपक्रम की प्रस्तावना की जा सकी । ‘दूसरा सप्तक’ के सात कवियों में रघुवीर सहाय शामिल थे। उनकी कवित संवेदना, सरोकार, विषयवस्तु, अनुभव, भाषा, शिल्प आदि अनेक तलों पर अपने संकल्प और व्यवहार में नई थी ।

उनकी विशिष्ट मनोरचना और व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति कहानियों और उनकी पत्रकारिता में भी हुई; एक नया क्षितिज खुल पड़ा । निश्चय ही इस बड़ी युगांतरकारी घटना में अनेक कवियों-रचनाकारों की भूमिका थी। यह एक सामूहिक प्रयत्न था । पर इस सामूहिक प्रयत्न में रघुवीर सहाय बिना अगल-बगल झाँके अपनी समूची क्षमता और ईमानदार संलग्नत के साथं जुटे रहे । यह सिलसिला आगे तक चलता रहा और लगभग उनके रचना-दर्शन का अंग बन गया।

रघुवीर सहाय की कविता ऊपर कथित अपने परिवेश से उलझकर और उसके प्रति अनुभूत सच्चाई की साहसपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ही अपना औचित्य और सार्थकता हासिल करती है। कई बार यह प्रतिक्रिया निर्मम तीखी और दाहक भी हो उठती है पर ऐसा हर्गिज नहीं होता कि इस निर्ममता और दाहकता के लिए कवि अपनी पीठ ठोके, इसमें रस या सुख पाए, इसे अपनी वीरमुद्रा बना ले और दूसरे शब्दों में यह उसकी कविता की आभूषण-संपद बन जाए ।

रघुवीर सहाय व्यंग्य-कटाक्ष, घृणा और क्रोध का बहुधा उपयोग करते हैं, बड़े सार्थक उपयोग; किंतु उद्देश्य में निहितार्थ परपीड़न का सुख नहीं होता, सच्ची रचनात्मकता या कहें, अर्थपूर्ण नई सामाजिकता होती है । जातिवादी ऊँच-नीच, अमीर-गरीब आदि विभाजनों पर टिकी हुई समाज संरचना; स्वार्थ-दोहन, ठगी और पाखंड पर टिकी हुई राजनीति और संस्कृति को लेकर रघुवीर सहाय सतत सजग और सचेत रहे हैं।

उन्हें सौंदर्य से ज्यादा हमेशा ही सत्य. कविकर्म का ध्येय लगता रहा है, बल्कि यह कहना शायद अधिक उपयुक्त हो कि सच के साहसपूर्ण उद्घाटन में ही । उनके निकट सौंदर्य के लिए सूरत निकल पाती रही है । ऐतिहासिक परिस्थितियों के दबाव में बदलते जाने की लाचारी में लगातार काइयाँ और धूर्त बनते जाते समाज के समानांतर रघुवीर सहाय को अपनी कविता की जमीन, पैंतरे और चरित्र बार-बार बदलते रहने पड़े-और यही कवि की रचनायात्रा रही; कभी थकने न देनेवालो, हमेशा चौकस।

यहाँ प्रस्तुत कविता उनके संग्रह ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ से ली गई है और एक. ग्य कविता है। ऐसी व्यंगर कविता जिसमें हास्य नहीं, आजादी के बाद के सत्ताधारी वर्ग के प्रति रोषपूर्ण तिक्त कटाक्ष है। राष्ट्रीय गान में निहित ‘अधिनायक’ शब्द को लेकर यह व्यंग्यात्मक कटाक्ष है । आजादी हासिल होने के इतने वर्षों के बाद भी आम आदम दलाव नहीं आया ।

कविता में ‘हरचरना’ इसी आम आदमी का शनिधि है। वह एक स्कूल जानेवाला बदर गरीब लड़का है जो अपनी आर्थिक-सामाजिक हालत के विपरीत – रिकतावश सरकारी स्कूल में पढ़ता है । राष्ट्रीय त्योहार के दिन झंडा फहराए जाने के जलसे में वह ‘फटा सुथन ने वही राष्ट्रगान दुहरात है जिसमें इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी न जाने किस ‘अधिनायक’ का गुणगान किया है।

सत्ताधारी वर्ग बदर हुए जनतांत्रिक संविधान से चलती इस व्यवस्था में भी राजसी ठाठ-बाट वाले भड़कील दाब के साथ इस जलन * में शिरकत कर अपना गुणगान अधिनायक के रूप में करवाए जा रहा है । कविता में निहितार्थ ध्वनि यह है मानो इस सत्ताधारी वर्ग की प्रच्छन्न लालसा हो सचमुच अधिनायक अर्थात तानाशाह बनने की।

समाज में रहते हुए मैं दाढ़ी बढ़ाकर नहीं घूमता, कपड़े इस तरह के नहीं पहनता कि लोग कह उठे, वह देखो, कवि आया; और बात इस तरह से नहीं करता कि लोग परे हटकर अदब से बैठें । पर बात इस तरह जरूर करता हूँ कि सिर्फ वे ही लोग दुबारा मिलना चाहें जो निर्भय हैं और बिना अकारण आदर दिखाए या अकारण, आदर माँगे दुबारा मिल सकते हैं।

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