Shamsher Bahadur Singh Biography Hindi | शमशेर बहादुर सिंह जीवनी

नाम : शमशेर बहादुर सिंह
जन्म : 13 जनवरी 1911
निधन : 1993
जन्म-स्थान : देहरादून, उत्तराखंड । माता-पिता : प्रभुदेई एवं तारीफ सिंह (कलेक्ट्रिएट में रीडर और साहित्य प्रेमी)।
शिक्षा : 1928 में हाई स्कूल, 1931 में इंटर, 1933 में बी० ए०(इलाहाबाद से), 1938 में एम० ए० (पूर्वार्ध) अंग्रेजी, आगे पढ़ाई नचल सकी।
पारिवारिक जीवन : 1929 में धर्म देवी से विवाह । 1933 में पत्नी की मृत्यु । फिर परिवार विहीन अनिश्चित जीवन । वृत्ति रूपाभ, कहानी, माया, नया साहित्य, नया पथ एवं मनोहर कहानियाँ के संपादन कार्य से जुड़े। उर्दू-हिंदी कोश का भी संपादन । 1981-85 तक ‘प्रेमचंद सृजनपीठ’ विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के अध्यक्ष ।
यात्रा : 1978 में सोवियत रूस की यात्रा।
कृतियाँ : 1932-33 में लिखना शुरू किया । दूसरा सप्तक (1951), कुछ कविताएँ (1959), कुछ और कविताएँ (1961), चुका भी नहीं हूँ मैं (1975), इतने पास अपने (1980), उदिता (1980), बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1982), टूटी हुई बिखरी हुई, कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूँ, सुकून की तलाश (गजलें) ।

प्रतिनिधि कविताएँ (सं०-डॉ. नामवर सिंह) – सभी
कविताएँ । डायरी, विविध प्रकार के निबंध एवं आलोचना भी फूटकर रूप में प्रकाशित । अज्ञेय, नागार्जुन आदि के समकालीन शमशेर बहादुर सिंह आधुनिक हिंदी कविता में स्वच्छंद चेतना के प्रयोगशील कवि के रूप में दूसरा सप्तक’ में उदित हुए थे।

बीसवीं शती के उत्तरार्ध में सतत प्रयोगधर्मी श्रेष्ठ प्रगतिशील कवि के रूप में उन्होंने व्यापक प्रतिष्ठा अर्जित की। उन्होंने लिखना तीस के दशक में ही शुरू कर दिया था किंतु आजीविका, आवास, पारिवारिक जीवन आदि के अनिश्चय, अभाव तथा प्रकाशन को लेकर उदासीनता भरे विशिष्ट स्वभाव के कारण उनकी कविताएँ पुस्तकाकार शती के उत्तरार्ध में ही आनी शुरू हुईं ।

शीघ्र ही शमशेर बहादुर सिंह हिंदी के विशिष्ट और प्रमुख कवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गए । विशिष्टता उनके लेखन में कवि और काव्य के स्वभाव एवं आग्रहों के कारण निरूपित हई। वे कवि और शायर एक साथ थे।

स्वच्छंदतावाद, प्रगतिवाद. प्रयोगवाद. नई कविता तथा वस्तुवादी यथार्थवाद और कलावादी रूपवाद – इन सबका एक ऐसा विलक्षण घोल उन्होंने अपनी सर्जनात्मकता में तैयार किया जिसमें इन सब की सीमाएँ नहीं, शक्ति सक्रिय और मुखरित हुई ।

हिंदी और उर्दू को तथा इनकी कविता शैलियों और संस्कृतियों को उन्होंने एक माना ही नहीं, जाना और अनुभव भी किया । कवि के लिए दोनों दो नहीं, एक हैं: इसी रूप में शमशेर के यहाँ उनकी अभिव्यक्ति भी होती है। भेद है सिर्फ शैली का; ऊपरी। भीतरी एकता अखंड और अक्षुण्ण है।

उर्दू काव्य और आधुनिक हिंदी काव्य की विरासत को उन्होंने मिजाज, रंग, स्वर, लय और भंगिमाओं के साथ अपनी खास संवेदना और कल्पनाशीलता के सहारे अपने ढंग से आत्मसात् किया ।

उनके समकालीन जहाँ ‘छायावाद’ से खुद को विलगाने और अलग-थलग, विशिष्ट दिखने के प्रति आग्रहशील रहे वहाँ शमशेर ने एक ही संधान में निराला और पंत दोनों को साधा कविता, चित्र, संगीत, नाटक, नृत्य, मूर्ति आदि विविध कलाओं के सर्जनात्मक प्रभाव उन्होंने अपनी कविता की स्वायत्त जमीन और शर्तों पर ग्रहण किए।

स्थानीय और सार्वभौम, क्षणिक और सनातन, जटिल और सरल, ठोस और वायवीय, मूर्त और अमूर्त, ऐंद्रिय और आध्यात्मिक-तमाम तरह के विरोधों को अपने विलक्षण वस्तु विधान और ऐंद्रिय संस्पर्श के साथ, कल्पना प्रवण अनुभूति के रंग में डुबोकर एक सजीत संरचना में ढाल देते हैं। उनमें अद्भुत कला संयम, संक्षिप्ति और सांकेतिकता है।

उनकी कविताएँ एक अनिवार्य चुनौती की तरह दिपदिपाती रहती हैं, ऐसी चुनौती जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो । वे कई-कई पाठों में भी अक्सर नि:शेष नहीं होती । उनमें कुछ चमकता रह जाता है जो अर्थपूर्ण प्रतीत होता है । प्रायः उनके समकालीनों से लेकर अब तक के सभी महत्त्वपूर्ण आलोचकों और चिंतनशील सर्जकों ने उनपर अवश्य लिखा है और उनकी कविता को समझने-समझाने की कोशिशें की हैं। वे ‘कवियों के कवि’ कहे जाते हैं ।

यहाँ उनकी प्रसिद्ध कविता ‘उषा’ संकलित है जिसमें उन्होंने ‘उषा’ का गतिशील चित्रण बिंबों द्वारा प्रस्तुत किया है। यह चित्रण एक प्रभाववादी चित्रकार की तरह किया गया है। प्रभाववादी चित्रकार वस्तु या दृश्य के मन और संवेदना पर पड़े प्रभावों का उनकी विशिष्ट रंग-रेखाओं के सहारे चित्रण करता है।

उषा में एक जादू है जिसमें विमुग्ध-तल्लीन कविदृष्टि उसके साथ-साथ बढ़ती और उसे सजग ऐंद्रियबोध और मानस में जज्ब करती जाती है। कविता का समापन इस जादू से गुजरते हुए बाहर निकल आने पर होता है ।

उषा के साथ-साथ क्रमश: चलती यह यात्रा एक संतृप्तिकर सौंदर्य यात्रा हो जाती है। शमशेर ऐसे कवि हैं जो अपना असर धीरे-धीरे डालते हैं। शमशेर जैसे कवियों का कोई ‘स्कूल’ नहीं बनता, उनकी कोई पंथ-प्रतिमा नहीं बनती। वे उन नदियों की तरह होते हैं जो चुपचाप पूरी घाटी को जरखेज करती चलती हैं, जिनपर कभी कोई पुल नहीं बनता. – अरुण कमल

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।

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