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Varsha Ritu Par Nibandh in Hindi | वर्षा ऋतु पर निबंध

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आज का यह निबंध वर्षा ऋतु पर निबंध (Varsha Ritu Par Nibandh in Hindi) दिया गया हैं। आप इस निबंध को ध्यान से और मन लगाकर पढ़ें और समझें। यहां पर दिया गया निबंध कक्षा (For Class) 5th, 6th, 7th, 8th, 9th, 10th और 12th के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त हैं। विद्यार्थी परीक्षा और प्रतियोगिताओं के लिए इस निबंध से मदद ले सकते हैं।

Varsha Ritu Par Nibandh in Hindi

भारत में वर्षा ऋतु एक बेहद ही महत्वपूर्ण ऋतु है। वर्षा ऋतु आषाढ़, श्रावण तथा भादो मास में मुख्य रूप से होती है। वर्षाऋतू ऋतूओ में पटरानी है यह जब जब सजधज कर आती है तब सारी दुनिया खिलखिला उठती है: यह जब कोपभवन में जाती है तब एक दशरथ की बात कौन कहे, प्रतेक प्राणी की आँखों के आगे अँधेरा-सा छाने लगता है।

वैसे तो इस ऋतु का पर्यटन-काल आश्विन से कार्तिक तक है, किंतु राम-नाम के युगल वर्गों जैसे पवित्र सावन और भादो मास ही इसकी मनोवांछित लीला-भूमि हैं। वर्षाऋतु में प्राकृतिक सौंदर्य अपनी तरुणाई पर रहता है। लगता है, जैसे हरी मखमली कालीन पर प्रकृति-सुंदरी लेटी हो।

 

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इस ऋतु का गुणगान वैदिक ऋषियों ने निकामे निकामे नः पर्जन्योऽभिवर्षतु’, अर्थात ‘हमारे मन-मुताबिक बादल बरसा करें’ कहकर किया था। तब से शायद ही कोई उत्कृष्ट कवि हो, जिसने इसकी महिमा न गायी हो। आदिकवि वाल्मीकि ने लिखा है कि बिजली की पताका और बलाका की माला धारण किये हुए शैलशिखर-से डीलडौलवाले मेघ रणमत्त गजेन्द्र की तरह गर्जन करते हैं।

हिंदी में विरहलीला के सहृदय गायक घनानंद कवि ने प्रार्थना की – ‘परजन्य जथारथ है बरसो’, अर्थात ‘हे परजन्य (पर्जन्य-बादल)! तुम्हारा नाम पर-(परायों के लिए) जन्य (उत्पन्न) है, अतः मुझ पराये के लिए भी अपने नाम की साख रखते हुए कुछ बरसो !’ वर्षाऋतु के आगमन से सर्वत्र संगीतोत्सव हो जाता है – भौरे का गुंजन वीणा की झंकार है, मेढ़क की ध्वनि कंठताल है तथा मेघगर्जन मृदंग की धमक है।

 

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‘नजीर’ अकबराबादी फरमाते हैं-

बादल हवा के ऊपर ही मस्त छा रहे हैं।
झड़ियों की मस्तियों से धूमें मचा रहे हैं।
पड़ते हैं पानी हरजा जल-थल बना रहे हैं।
गुलजार भीगते हैं, सब्जे नहा रहे हैं।
क्या-क्या मची हैं, यारो, बरसात की बहारें।

वर्षाऋतु केवल नयन-रंजन ही नहीं करती, वरन इसके आगमन पर ही कृषि का फल निर्भर करता है-ऐसा कविकुलगुरु कालिदास ने ठीक ही कहा है। अँगरेजी की एक कहावत है Handsome is that handsome does. वर्षाऋतु सुंदर इसलिए भी है कि यह सुंदर काम करती है।

सारे संसार में अकाल का ताण्डव हो जाय, भूख की ज्वाला में सृष्टि की हर खूबसूरत कली मुरझा जाय, यदि वर्षादेवी का पदार्पण न हो। सावन की बदरिया बरसकर भले ही, किसी दीवानी मीरा को उसके मनभावन के आवन की सुधि दे जाय, किंतु हमें तो इसमें नवजीवन की शिवा के आगमन की ही सूचना मिलती है।

 

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कभी-कभी अतिवृष्टि हो जाती है और इसमें हमें किसी इंद्रकोप की भनक मिलने लगती है और तब सरकार को बड़ी मुश्किल से गोवर्द्धन उठाना पड़ता है; किंतु अतिवृष्टि से जो जन-धन की क्षति होती है, उसकी पूर्ति असंभव है। सचमुच ‘अति’ होती ही बुरी है-अति सर्वत्र वर्जयेत्!

फिर भी, वर्षाऋतु महारानी ही नहीं, वह महादेवी है जिसके कृपा-कटाक्ष के लिए हम सभी लालायित रहते हैं। इसके आज्ञाकारी अनुचर मेघ से हम कह उठते हैं- ‘हे मेघ! तुम सूर्य के लाल नयन में काजल डालकर उसे सुला दो, वृष्टि के चुंबन बिखेरकर तुम चले जाओ, जिससे हमारे अंग हर्ष से फड़क उठे।

Mukul Dev

मेरा नाम MUKUL है और इस Blog पर हर दिन नयी पोस्ट अपडेट करता हूँ। उमीद करता हूँ आपको मेरे द्वार लिखी गयी पोस्ट पसंद आयेगी।